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Wednesday, March 12, 2014

राष्ट्रपति की ‘क्षमादान शक्ति’ की न्यायिक व्याख्या


विधान के अनुच्छेद 72 के अंतर्गत निहित क्षमादान इत्यादि की शक्ति राष्ट्रपति का कोई दया का मामला नहीं है बल्कि यह देश की जनता द्वारा उनमें विश्वास के रूप में निहित किया गया एक सांविधानिक कर्त्तव्य है। मृत्युदंड के निष्पादन में अत्यधिक, अनावश्यक और अतार्किक विलंब अमानवीय तथा कैदी को  यातना देने के समान है, जिससे उसके संविधान के अनुच्छेद-21 के अंतर्गत प्रदत्त प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का उल्लंघन होता है। इसलिए वह अपने मृत्यु दंडादेश को आजीवन कारावास में परिवर्तित करवाने का हकदार है। उपर्युक्त व्यवस्था के साथ उच्चतम न्यायालय की तीन सदस्यीय पूर्णपीठ ने न केवल राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति की न्यायिक व्याख्या की है अपितु मृत्युदंड की सजा प्राप्त उन 15 कैदियों की फांसी की सजा को भी आजीवन कारावास में बदल दिया है, जिनकी दया याचिकाएं राष्ट्रपति ने अस्वीकार कर दी थी और उनके मृत्युदंड के निष्पादन की तैयारी की जा रही थी।
उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी. सथशिवम और न्यायमूर्तिगण रंजन गोगोई तथा शिवकीर्ति सिंह की तीन सदस्यीय पूर्णपीठ ने 21 जनवरी, 2014 को अपने ऐतिहासिक और मार्गदर्शक निर्णय में भारत के संविधान के अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति की और अनुच्छेद 161 के अंतर्गत राज्यपाल की न्यायिक शक्ति अर्थात क्षमादान आदि शक्तियों की पूर्ण व्याख्या प्रस्तुत की।
शत्रुघ्न चौहान और एक अन्य बनाम भारत संघ और अन्य (2014) नामक याचिका पर अंतिम निर्णय देते हुए उच्चतम न्यायालय की पूर्णपीठ ने 15 याचियों के मृत्युदंड को आजीवन कारावास में परिवर्तित करते हुए निम्नलिखित व्यवस्था दी है-
  • अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति में और अनुच्छेद 161 के अंतर्गत राज्यपाल में निहित शक्ति एक सांविधानिक कर्त्तव्य है। यह न तो कोई दया का मामला है और न ही विशेषाधिकार का बल्कि यह जनता के द्वारा सर्वोच्च प्राधिकारी में निहित किया गया एक महत्त्वपूर्ण सांविधानिक उत्तरदायित्व है।
  • क्षमादान इत्यादि की शक्ति यद्यपि न्यायिक समीक्षा से परे है किंतु अनुच्छेद 72/161 के अंतर्गत शक्तियों के प्रयोग के तरीके की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
  • मृत्युदंड के निष्पादन में असम्यक, असाधारण  और अयुक्तियुक्त विलंब कैदी को यातना (टार्चर) देने के समान है, जो कि उसे अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त मूल अधिकार (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता) का उल्लंघन करता है।
  • दया-याचिका के निस्तारण में यदि कार्यपालिका (राष्ट्रपति) की ओर से अत्यधिक विलंब किया गया है या याचिकाकर्ता पागलपन या मानसिक अस्वस्थता इत्यादि से ग्रसित है तो यह मृत्युदंड को आजीवन कारावास में परिवर्तित करने का एक आधार होगा और इसके लिए याचिकाकर्ता अपनी दया-याचिका राष्ट्रपति द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने के बाद अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय के समक्ष याचिका प्रस्तुत करने का अधिकारी होगा।
  • प्रत्येक सिद्धदोष कैदी को दया-याचिका प्रस्तुत करने का संवैधानिक अधिकार है। यहां तक कि ‘टाडा’ मामले में मृत्युदंड की सजा प्राप्त कैदी भी दया-याचिका प्रस्तुत कर सकता है।
  • दया-याचिका पर उचित प्रक्रिया के तहत विचार किया जाना कैदी का अनुच्छेद-21 के अंतर्गत मूल अधिकार है।
  • यद्यपि दया-याचिका के निस्तारण के लिए कोई समय-सीमा नियत नहीं है किंतु इसे अवश्य ही एक निश्चित और युक्तियुक्त समय-सीमा के भीतर निस्तारित किया जाना चाहिए।

महत्त्वपूर्ण दिशा-निर्देश

उपर्युक्त निर्धारण के अलावा उच्चतम न्यायालय ने अनेक दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं ताकि भविष्य में मृत्युदंड से दंडित किसी सिद्धदोष कैदी की दया-याचिका के निस्तारण में इतना विलंब न हो कि वह एक दिन मरने (फांसी) के बजाय प्रायश्चितार्थ मानसिक रूप से उस प्रत्येक दिन मृत्यु का अनुभव करे जब तक उसकी दया-याचिका लंबित रहे।
मृत्युदंड की सजा पाए कैदियों के मूल अधिकारों की रक्षा और उनकी दया-याचिकाओं के शीघ्र निस्तारण के लिए जिन दिशा-निर्देशों को जारी किया गया है, उनमें मुख्य निर्देश इस प्रकार हैं-
  • दया-याचिका का निस्तारण युक्तियुक्त समय के भीतर किया जाना चाहिए।
  • दया-याचिका को अस्वीकार किए जाने के पूर्व कैदी का एकांत परिरोध या एकल परिरोध (काल कोठरी में डाला जाना) असंवैधानिक है। अतः जेल के कारावास के नियम इस निर्धारण एवं अनुच्छेद 21 के अंतर्गत संशोधित किए जाएं।
  • दया-याचिका प्रस्तुत करने के लिए प्रत्येक कैदी को अनुच्छेद 39-A के अंतर्गत निःशुल्क विधिक सहायता प्रदान करने की राज्य सरकार के द्वारा व्यवस्था की जाए।
  • याचिका अस्वीकार किए जाने की सूचना संबंधित कैदी को और उसके परिवार के सदस्यों को लिखित रूप में दी जाए। इसके साथ ही साथ सभी महत्त्वपूर्ण आवश्यक दस्तावेज भी उसे उपलब्ध कराए जाएं।
  • मृत्युदंड की सजा प्राप्त कैदी राष्ट्रपति या राज्यपाल के द्वारा दया-याचिका अस्वीकार किए जाने पर ‘अस्वीकृति’ की एक प्रति प्राप्त करने का अधिकारी है।
  • मृत्युदंड का निष्पादन किए जाने से 14 दिन पूर्व संबंधित कैदी को इसकी सूचना दी जाए। ऐसे निष्पादन से पूर्व उसकी शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का परीक्षण किया जाए तथा उसके एवं उसके परिवार के सदस्यों के बीच अंतिम मुलाकात का प्रबंध किया जाए।
  • फांसी की सजा के निष्पादन के बाद मृतक के शरीर का मृत्योपरांत परीक्षण (पोस्टमॉर्टम) कराया जाए।

क्या था मामला?

देश के राष्ट्रपति एवं राज्यपाल को संविधान प्रदत्त न्यायिक शक्ति (क्षमादान) को चुनौती देने वाला यह मामला अपने आप में एक लंबा इतिहास समेटे हुए है। उच्चतम न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत 16 याचिकाओं में से 15 याचिकाएं स्वयं मृत्युदंड पाए कैदियों द्वारा या उनकी ओर से किसी अन्य (पारिवारिक सदस्य) ने अनुच्छेद 32 के अंतर्गत प्रस्तुत की थीं। इन सभी की दया-याचिकाएं राष्ट्रपति ने खारिज कर दी थीं। अतः उनके मृत्युदंडादेश का निष्पादन (फांसी दिया जाना) होना था। इन सभी याचिकाओं में सामान्य बात यह थी कि अधिकांश मामलों में दया-याचिका अस्वीकार करने में राष्ट्रपति की ओर से 6 वर्ष से लेकर 12 वर्ष तक का समय लिया गया था, जबकि दो मामलों में कैदी मानसिक रूप से अस्वस्थ थे। इसी परिप्रेक्ष्य में पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (PUDR) की ओर से एक याचिका प्रस्तुत करके दया-याचिकाओं के निस्तारण के लिए दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई थी। इन सभी मामलों में याचिका क्षमादान के लिए नहीं अपितु मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदलने के लिए प्रस्तुत की गई थी।
इस मामले में याचिकाकर्ताओं यथा-शत्रुघ्न चौहान और महिंदर चौहान के परिवार के सदस्यों सुरेश और रामजी (वाराणसी, उत्तर प्रदेश) को अपने ही परिवार के पांच सदस्यों की हत्या के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के अंतर्गत मृत्युदंड की सजा दी गई थी, जिसकी पुष्टि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी 23 फरवरी, 2000 को कर दी थी और 20 मार्च, 2001 को उच्चतम न्यायालय के द्वारा अपील निरस्त होने के बाद सुरेश और रामजी ने क्रमशः 9 मार्च, 2001 और 29 अप्रैल, 2001 को राष्ट्रपति के समक्ष दया-याचिका प्रस्तुत की थी, जिसे 12 वर्ष के बाद राष्ट्रपति के द्वारा अंततः 8 फरवरी, 2013 को अस्वीकार कर दिया गया था। इन 12 वर्षों के दौरान याची की याचिका राज्य सरकार, गृह मंत्रालय और राष्ट्रपति के कार्यालय में चक्कर लगाती रही, किंतु इसके निस्तारण में लगे 12 वर्षों के समय का कोई भी क्षम्य, युक्तियुक्त और तर्कपूर्ण कारण नहीं दिया जा सका। अंततः उच्चतम न्यायालय ने स्वयं वह कार्य किया जिसे राष्ट्रपति को करना चाहिए था। ऐसा ही विलंब अन्य याचिकाओं में भी हुआ था, जिस पर उच्चतम न्यायालय ने दया-याचिकाओं की सांविधानिक तथा कैदी के मूल अधिकारों के परिप्रेक्ष्य में व्याख्या प्रस्तुत की।

क्या है दया याचिका?

संविधान के अनुच्छेद 72 में राष्ट्रपति (राष्ट्र-प्रमुख) को और अनुच्छेद 161 में राज्यपाल (राज्य प्रमुख) को किसी अपराध के लिए सिद्धदोष व्यक्ति के अपराध को क्षमा करने की शक्ति प्रदान की गयी है, जिसमें दंड को कम कर देने या उसकी प्रकृति को परिवर्तित कर देने की भी शक्ति सम्मिलित है। अतः जब कोई कैदी अपने दंड को क्षमा करने या कम करने का याचना-पत्र (याचिका) राष्ट्रपति या राज्यपाल को भेजता है तो उसे ही सामूहिक रूप में दया-याचिका की संज्ञा दी जाती है। राष्ट्रपति की  यह शक्ति हमारे देश में स्थापित इस प्राचीनतम अवधारणा पर आधारित है कि ‘राजा’ किसी भी अपराधी के दंड को पूर्णतः क्षमा कर सकता है। चूंकि राजा देश का प्रमुख होता था, अतः यह शक्ति संविधान के द्वारा देश एवं राज्य के प्रमुख क्रमशः राष्ट्रपति एवं राज्यपाल में निहित की गयी है।

दया-याचिका के निस्तारण की प्रक्रिया

हमारी न्यायिक प्रणाली के अंतर्गत किसी व्यक्ति की हत्या जैसे जघन्य अपराध, जिसका वर्तमान या भूतकाल में कोई दृष्टांत नहीं मिलता अर्थात वह मामला विरल से भी विरलतम है, में मृत्युदंड प्रारंभतः सत्र न्यायालय द्वारा दिया जा सकता है, जिसकी पुष्टि उच्च न्यायालय के द्वारा की जाती है। दोषी व्यक्ति उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकता है और अपील निरस्त हो जाने पर वह दंडादेश अंतिम हो जाता है और उसके निष्पादन की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है, किंतु संविधान के अनुच्छेद 72 के अंतर्गत व्यक्ति अपने दंड के क्षमादान के लिए ‘राष्ट्रपति’ के समक्ष दया-याचिका प्रस्तुत कर सकता है। दया-याचिका प्रस्तुत कर दिए जाने पर मृत्युदंड का निष्पादन याचिका पर निर्णय होने तक के लिए स्थगित कर दिया जाता है।

दया-याचिका निस्तारण का राजनीतिकरण

जब दया-याचिका राष्ट्रपति के समक्ष भेजी जाती है तो राष्ट्रपति उसे गृह मंत्रालय/राज्य सरकार को भेज देते हैं। गृह मंत्रालय/राज्य सरकार की सिफारिश के अनुसार राष्ट्रपति याचिका को स्वीकार अथवा अस्वीकार करने का निर्णय लेते हैं। चूंकि राष्ट्रपति का निर्णय मंत्रिपरिषद के विनिश्चय पर आधारित होता है (अनुच्छेद 74), इसलिए इस पर ‘राजनीतिक प्रभाव’ स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यही कारण है कि अनेक मामलों में ‘राजनीतिक-स्वार्थ’ से परिपूर्ण विनिश्चय देखने को मिले। अंततः एपुरु सुधाकर और एक अन्य बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य (2006) के मामले में उच्चतम न्यायालय को यह निर्णीत करना पड़ा कि यदि अनुच्छेद 72/161 के अंतर्गत राष्ट्रपति एवं राज्यपाल के शक्तियों का प्रयोग राजनीतिक फायदे के लिए किया गया है तो उसे न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है, फिर भी सरकार की प्रवृत्ति में कोई अंतर नहीं आया।
इस मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि वर्ष 1980 तक दया-याचिकाओं के निस्तारण में 15 दिन से लेकर 10-11 महीनों का समय लिया गया, किंतु 1980 से 1988 के बीच में यह अवधि औसतन 4 वर्ष की हो गई और उसके बाद तो स्थिति इतनी गंभीर हुई कि यह 12 वर्षों तक लंबित रहा। यह भी स्मरणीय है कि आतंकी अजमल कसाब और संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु को फांसी दिए जाने का मामला तूल न पकड़ता तो यह अवधि और भी विस्तारित हो सकती थी। यहां भी राजनीति हावी रही।

निर्णय का प्रभाव

उच्चतम न्यायालय के द्वारा दिए गए इस निर्णय का निश्चय ही भविष्यलक्षी प्रभाव होगा। फिलहाल इस निर्णय में दिए गए आधारों पर देविंदर पाल सिंह भुल्लर (जिसने 14 जनवरी, 2003 को अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति के समक्ष दया-याचिका प्रस्तुत की थी और जिसकी याचिका को राष्ट्रपति ने लगभग 9 वर्ष बाद 13 जून, 2013 को अस्वीकार कर दिया था, किंतु उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं होने तथा राजनीतिक व सांगठनिक विरोध के कारण उसके मृत्युदंड का निष्पादन नहीं हो सका था) ने एक बार फिर उच्चतम न्यायालय के समक्ष याचिका प्रस्तुत की है। इसके साथ ही स्व. प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या में मृत्युदंड की सजा पाए तीन कैदियों  ने भी अपनी मृत्युदंड को आजीवन कारावास में परिवर्तित किए जाने की याचिका प्रस्तुत की थी, जिन पर निर्णय देते हुए उच्चतम न्यायालय की इसी पीठ ने गत 18 फरवरी, 2014 को तीनों कैदियों मुरुगन, सान्तन और पेरारिवलन के मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया है। इनकी भी याचिका राष्ट्रपति के समक्ष पिछले 11 वर्षों से लंबित थी, जिसे पिछले वर्ष राष्ट्रपति के द्वारा अस्वीकार कर दिया गया था। फिलहाल यह पहला मामला है जब किसी आतंकी के मामले में विलंब के आधार पर मृत्युदंड की सजा को आजीवन कारावास में परिवर्तित किया गया है।

सांविधानिक व्यवस्था

  • अनुच्छेद 72-क्षमा आदि की और कुछ मामलों में दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की राष्ट्रपति की शक्ति-
1. राष्ट्रपति को, किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराये गए किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने की अथवा दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की शक्ति होगी-
(क) उन सभी मामलों में, जिसमें दंड या दंडादेश सैन्य न्यायालय ने दिया है;
(ख) उन सभी मामलों में, जिसमें दंड या दंडादेश ऐसे विषय संबंधी किसी विधि के विरुद्ध अपराध के लिए दिया गया है, जिस विषय तक संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है;
(ग) उन सभी मामलों में, जिनमें दंडादेश, मृत्यु दंडादेश है।
2. खंड (1) के उपखंड (क) की कोई बात संघ के सशस्त्र बलों के किसी ऑफिसर की सेना न्यायालय द्वारा पारित दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की विधि द्वारा प्रदत्त शक्ति पर प्रभाव नहीं डालेगी।
3. खंड (1) के उपखंड (ग) की कोई बात तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन किसी राज्य के राज्यपाल के द्वारा प्रयोक्तव्य मृत्युदंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की शक्ति पर प्रभाव नहीं डालेगी।
  • अनुच्छेद 161- क्षमा आदि की और कुछ मामलों में दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की राज्यपाल की शक्ति-किसी राज्य के राज्यपाल को उस विषय संबंधी जिस विषय पर राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है, किसी विधि के विरुद्ध किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराये गए किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने की अथवा दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की शक्ति होगी।
  • अनुच्छेद 72 एवं 161 में मुख्य अंतर-मृत्यु दंडादेश को पूर्णक्षमा की शक्ति केवल ‘राष्ट्रपति’ में ही निहित है, जबकि शेष शक्ति राष्ट्रपति एवं राज्यपाल दोनों में निहित है।
  • उच्चतम न्यायालय से अपील निरस्त होने के बाद 7 दिन के भीतर दया-याचिका राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत की जा सकती है।

मृत्युदंडादेश : स्मरणीय तथ्य

  • भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 53 के अंतर्गत मृत्युदंड एक विधिपूर्ण दंड है और राज्य के विरुद्ध युद्ध या किसी व्यक्ति/व्यक्तियों की हत्या के मामले में मृत्युदंड की सजा दी जा सकती है।
  • मृत्यु दंडादेश दिए जाने की दशा में ऐसे दंडादेश का विशेष कारण लिखना अनिवार्य होता है तथा यह भी कि ”उसे गर्दन में फांसी लगाकर तब तक लटकाया जाए जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए।”
  • संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रस्ताव संख्या 65/2000 दिनांक 27 अप्रैल, 2000 का खंड (3) (e) सदस्य देशों से मानसिक अस्वस्थता से पीड़ित व्यक्ति को मृत्युदंड की सजा नहीं देने अथवा ऐसी सजा प्राप्त कैदी का मृत्युदंड निष्पादित नहीं करने की अपील करता है। भारत संयुक्त राष्ट्र का सदस्य होने के कारण इस प्रस्ताव पर विचार करने के लिए बाध्य है।
  • संयुक्त राष्ट्र महासभा के 62वें सत्र में 18 दिसंबर, 2007 को एक प्रस्ताव पारित करके कहा गया कि यद्यपि मृत्युदंड की सजा कायम रखा जाना एक चिंताजनक विषय है किंतु जब कभी इसे अधिरोपित या निष्पादित किया जाए उस समय अंतर्राष्ट्रीय मानवीय मानकों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
  • वर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने पदभार ग्रहण करने के बाद अतबीर नामक कैदी की दया-याचिका को स्वीकार करके उसके मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया था। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से अभयदान पाने वाला अतबीर प्रथम व्यक्ति है।
  • इसके पूर्व तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने अपने कार्यकाल में सर्वाधिक 23 कैदियों के मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया था जो अब तक निस्तारित याचिकाओं का 90 प्रतिशत है।

Tuesday, February 4, 2014

दिल्ली जनलोकपाल बिल


>>संसद से पास लोकपाल कानून और अन्य राज्यों के लोकायुक्त कानून में जो प्रावधान छूट गए हैं, उन्हें भी शामिल किया गया है।

>>भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को सजा जल्द मिल सकेगी।

>>दिल्ली लोकपाल बिल के दायरे में मुख्यमंत्री से दिल्ली सरकार के चपरासी तक आएंगे।

>>
लोकपाल के अध्यक्ष और दस सदस्यों का चयन सात सदस्यीय समिति करेगी। इनका कार्यकाल सात साल होगा। एक तिहाई सदस्य कानून के जानकार होंगे। 
>>चयन समिति में सरकार के नामित सदस्य सिर्फ मुख्यमंत्री होंगे। नेता प्रतिपक्ष, उच्च न्यायालय के दो न्यायाधीश जो सभी की बैठक में चुने जाएंगे, एक पूर्व लोकायुक्त, दो प्रतिष्ठित नागरिक होंगे, जिनका चयन समिति के अन्य सदस्य मिलकर करेंगे।

>>मुख्यमंत्री या मंत्री के खिलाफ भी भ्रष्टाचार के मामले सामने आते हैं तो कोई विशेषाधिकार नहीं होगा, जबकि उत्तराखंड विधानसभा ने 2011 में जो बिल पास किया है, उसमें मुख्यमंत्री व मंत्री के खिलाफ शिकायत दाखिल करने के लिए कुछ सीमाएं तय की गई हैं। 

>>लोकपाल को स्वयं संज्ञान या किसी व्यक्ति से शिकायत मिलने पर जांच शुरू करने की शक्ति दी गई है। 

>>भ्रष्टाचार के मामले में 6 महीने से 10 साल तक की सजा का प्रावधान है और दुर्लभ मामलों में आजीवन कारावास की सजा भी सुनाई जा सकती है।
>>इस बिल में पहली बार विसलब्लोवर और भ्रष्टाचार केस के गवाहों और भ्रष्टाचार उजागर करने के लिए आगे आने वाले अधिकारियों को संरक्षण का अधिकार दिया गया है।

>>ईमानदार अधिकारियों और देश के लिए कठिन परिश्रम करके काम करने वालों को सालाना विशेष पुरस्कार देने का भी प्रावधान है।

>>भ्रष्टाचार मामलों की समयबद्ध जांच और सुनवाई का प्रावधान।

>>
भ्रष्टाचार की वजह से फायदा उठाने वाली अगर व्यवसायी इकाई है तो कानून में सजा प्रावधानों के अलावा सरकारी खजाने को नुकसान से पांच गुना तक जुर्माना भी चुकाना होगा।

Sunday, February 2, 2014

जनहित याचिका - लोकतंत्र का पांचवां स्तंभ



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हम अपने संविधान की चाहे जितनी आलोचना कर लें और इसे जितना बेकार कह लें, सच यह है कि अब तक इसने ही देश के नागरिकों को सम्मान से जीने का अधिकार दिया है और उस अधिकार के अतिक्रमण को दूर करने का रास्ता भी इसी ने दिया. इसका एक बड़ा उदाहरण है जनहित याचिका. यह जनता के संवैधानिक अधिकारों के इस्तेमाल और अदालत के कानूनी अधिकार से ही संभव हुआ है.

यह मुकदमे का एक प्रकार है, जो सामान्य मुकदमे से अलग है. इसके जरिये ऐसे विषयों पर न्यायालय से हस्तक्षेप और निर्देश की मांग की जाती है, जो व्यापक जनहित से जुड़े हों. यह लोकहित की रक्षा के लिए मुकदमे का एक ऐसा प्रावधान है, जिसने देश की जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों को बड़ी ताकत दी है. इसके अब तक के इस्तेमाल और नतीजों को देखें, तो साफ पता चलता है कि इसके जरिये लोकहित, संविधानहित और राष्ट्रहित में आम जनता ने सरकार, संसद, सेना, प्रशासन और न्यायालय के कामकाज के तौर-तरीकों में हस्तक्षेप किया है.  झारखंड और बिहार में बालू घाटों की बंदोबस्ती को लेकर दायर जनहित याचिकाएं सुर्खियों में रहीं. झारखंड में सरकार बैक फुट पर रही, जबकि बिहार का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है.

पटना हाई कोर्ट के 16 दिसंबर के अंतरिम आदेश के खिलाफ हेमंत कुमार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है, जिस पर अगले माह (फरवरी) में सुनवाई होनी है. अभी पुलिसकर्मियों के निलंबन की मांग को लेकर धरना देने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी सरकार के कानून मंत्री सोमनाथ भारती के खिलाफ अधिवक्ता एमएल शर्मा एवं अन्य ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की है. इस पर शुक्रवार, 24 जनवरी को सुनवाई शुरू हुई. सूचना का अधिकार अधिनियम आने के बाद गुणवत्तापूर्ण जनहित याचिका दाखिल करने की दर बढ़ी है. इसकी वजह है कि लोगों को सरकारी तंत्र से वैसी जानकारी और दस्तावेज प्रमाणिक रूप में मिलने लगे हैं, जिन्हें इससे पहले गुप्त बात अधिनियम, 1923 का हवाला देकर गोपनीय करार दिया जाता था और जनता से सही सूचना छुपायी जाती थी. अगर देखें, तो जनहित याचिका दाखिल करने का अधिकार लोकतंत्र का पांचवां स्तंभ है. हम इस अंक में इसी विषय पर विस्तार से बात कर रहे हैं.
आरके नीरद
भारतीय संविधान ने देश के प्रत्येक नागरिक को कुछ मूल अधिकार दिये हैं. इनकी संख्या छह है. इनमें स्वतंत्रता, समानता, शिक्षा और सांस्कृतिक तथा धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार एवं शोषण के खिलाफ अधिकार और मूल अधिकार पाने के उपाय.

जब भी किसी आम या खास नागरिक के इनमें से किसी अधिकार कर हनन होता है, तो वह याचिका दायर कर सकता है. इसके जरिये वह अपने संवैधानिक मूल अधिकारों की रक्षा के लिए गुहार लगा सकता है.
याचिका दो तरह की
याचिका दो तरह की है. एक व्यक्तिगत हित और दूसरा जनहित. जब ऐसे किसी विषय का संबंध व्यापक जनहित से हो, उसे जनहित याचिका कहते हैं. व्यक्तिगत हित की याचिका और जनहित याचिका में एक बुनियादी अंतर और है. जब कोई व्यक्ति अपने किसी मूल अधिकार के हनन के  खिलाफ याचिका दायर करता है, तो उसे केवल यह सिद्ध करना होता है कि उस मामले से उसका हित जुड़ा हुआ है. जैसे प्रोन्नति, वेतन, शिक्षा और रोजगार के अवसर आदि. जब जनहित याचिका दायर कर जाती है, तब व्यक्ति को यह सिद्ध करना होता है कि कैसे मामला जनहित यानी आम लोगों के हितों से जुड़ा है. पर्यावरण संरक्षण, भोजन का अधिकार, जीने का अधिकार आदि. दोनों मामले अलग-अलग हैं. निजी हित से जुड़े मामलों में दायर याचिका को पर्सनल इंट्रेस्ट लिटिगेशन कहते हैं. कोर्ट को यह तय करने का अधिकार है कि याचिका पब्लिक इंट्रेस्ट लिटिगेशन या पर्सनल इंट्रेस्ट लिटिगेशन.

न्यायालय की व्याख्या से निकली जनहित याचिका
सबसे दिलचस्प यह है कि जिस तरह संविधान में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में मीडिया या पत्रकारिता का उल्लेख नहीं है, लेकिन उसने अपनी सक्रियता, प्रभाव और परिणाम के आधार पर यह स्थान प्राप्त किया है. उसी प्रकार जनहित याचिका की संविधान में कोई परिभाषा नहीं है. उस व्याख्या से उत्पन्न हुआ है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने जनहित से जुड़े अलग-अलग मुकदमों की समीक्षा में व्यक्त किया. ठीक सूचनाधिकार की तरह इसमें इसकी जरूरत नहीं होती कि कोई पीड़ित व्यक्ति स्वयं अदालत में पेश हो. कोई दूसरा व्यक्ति भी पीड़ित की ओर से न्यायालय में जनहित दायर कर सकता है. न्यायालय स्वयं भी ऐसे मामले में संज्ञान ले सकता है और लेता रहा है. जनहित याचिका का प्रयोग किसी भी ऐसे क्षेत्र में हो सकता है, जो किसी नागरिक के मौलिक अधिकार और कर्तव्य में बाधा पैदा करता है या जिससे संवैधानिक और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. बाल मजदूरी, बंधुआ मजदूरी, बाल पोषण, मध्याह्न् भोजन, आपदा प्रबंधन, सामाजिक सुरक्षा, भूख से मौत एवं खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण एवं प्राकृतिक संसाधनों के दोहन एवं उत्खनन, नागरिक सुविधा एवं सुरक्षा, शहरी विकास, उपभोक्ता संरक्षण, शिक्षा के अवसर और नीतियां, निष्पक्ष और निर्भीक चुनाव, राजनीति और मानवाधिकार तथा न्यायालय से जुड़े मामले जनहित के विषय बनते रहे हैं. इसने न्यायिक सक्रियता को भी बढ़ाया है.

विषयों पर जनहित याचिका दाखिल की जा सकती है
आवासीय इलाकों में घरों की छतों पर मोबाइल कंपनियों के टावर. यह मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है. ज्यादातर मकानों का निर्माण इस तरह के टावर लगाने के लिए नहीं किया गया है. ऐसे मकान व्यावसायिक उपयोग के लिए भी नहीं हैं तथा उनके नक्शे में मोबाइल  टावर लगाने का प्लान नहीं है. यह कानूनी तौर पर गलत है.

झारखंड और बिहार के निजी स्कूलों में बच्चों की किताब, कॉपी, पोशाक, बैग आदि भी बेची जाती है. इसके लिए आपूर्तिकर्ता और विद्यालय प्रबंधन के बीच गुप्त समझौता रहता है. जिला शिक्षा  अधीक्षक और जिला शिक्षा पदाधिकारी की भी इसमें मौन सहमति होती है. बुक स्टोर में इस तरह की किताब और कॉपी की खरीद पर आपको 10 से 15 प्रतिशत तक  छूट मिलती है, लेकिन स्कूल के अंदर बेची जाने वाली किताब-कॉपी पर कोई  छूट दी जाती है. इसमें लाखों रुपये का खेल होता है, जबकि कोर्ट कह चुका है कि स्कूलों का व्यवसायीकरण नहीं हो सकता.

निजी बसों में मोटर वाहन अधिनियम और परमिट की शर्तो का पालन नहीं होता. बस के चालक और कंडक्टर की पहचान के लिए कुछ भी व्यवस्था नहीं है. वे न तो खास पोशाक में होते हैं और न ही उनकी कमीज पर कोई नामपट्ट होता है, जिससे कि उन्हें पहचाना जा सके. यह सीधा-सीधा मौलिक अधिकार का उल्लंघन है. एक पुलिस पदाधिकारी को वरदी मिलती है और उन्हें अपनी कमीज पर अपना नेम प्लेट लगाना होता है, जबकि इन बस चालकों और कंडक्टरों के लिए ऐसी कोई बाध्यता नहीं है.

Sunday, September 29, 2013

चुनाव सुधार की राह पर बढ.ते कदम

चुनाव सुधार की राह पर बढ.ते कदम


चुनाव सुधार भारत के लोकतंत्र के सामने मौजूद बेहद अहम मुद्दा है. हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट ने सक्रियता दिखाते हुए इस दिशा में कुछ ऐतिहासिक फैसले सुनाये हैं. मतदाता को ‘निगेटिव वोटिंग का अधिकार’ देनेवाले फैसले को इसका विस्तार माना जा सकता है. यह महज संयोग नहीं है कि जिस दिन सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आया, कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी दागी जन-प्रप्रतिनिधियों को राहत देनेवाले अपनी ही सरकार के अध्यादेश को बेतुका करार दे रहे थे. इसमें यह संदेश छिपा था कि राजनीतिक दलों को यह एहसास हो गया है कि जनता चुनाव सुधार चाहती है और इस प्रक्रिया को ज्यादा दिन तक रोक कर नहीं रखा जा सकता. चुनाव सुधार की दिशा में कितने दूर बढे. हैं हमारे कदम और अभी कितना सफर है बाकी, ऐसे ही मसलों की पड.ताल करता समय..

आगे बढे. हैं, लेकिन अभी दूर है मंजिल

सुभाष कश्यप
संविधानविद्

चुनाव सुधारों की कड.ी में सुप्रीम कोर्ट ने इवीएम में मतदाताओं को ‘इनमें से कोई नहीं’ का विकल्प देने का आदेश दिया है. यह आदेश महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे निर्वाचन प्रक्रिया में कोई बड.ा बदलाव आने की उम्मीद नहीं की जा सकती है. जमीनी स्तर पर चुनाव सुधार की दिशा में इसका असर नहीं पडे.गा, क्योंकि पहले भी मतदाताओं के पास उम्मीदवारों को खारिज करने का विकल्प था.

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पराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को संसद और विधानसभा में पहुंचने से किस तरह रोका जाये, यह कई वर्षों से चिंता का विषय रहा है. चुनाव सुधार को लेकर कई समितियां भी बनीं, लेकिन उनकी सिफारिशें सिर्फ बहसों का हिस्सा बन कर रह गयीं. वोहरा कमिटी ने राजनीति के अपराधीकरण को लेकर गंभीर चिंता जाहिर करते हुए इस पर अंकुश लगाने के लिए कई सुझाव दिये थे. लेकिन, यह रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गयी. उसी तरह इंद्रजीत गुप्ता कमिटी की रिपोर्ट में भी चुनाव सुधार को लेकर कई अहम सिफारिशें की गयी थीं. वर्ष 2000 में बने संविधान समीक्षा आयोग की रिपोर्ट में भी निर्वाचन व्यवस्था में व्यापक बदलाव की सिफारिश की गयी थी, ताकि राजनीति के अपराधीकरण पर रोक लगायी जा सके. लेकिन, राजनीतिक दलों की अनिच्छा के कारण चुनाव सुधार की दिशा में बडे. बदलाव नहीं हो पाये.

हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा राजनीति में अपराधी तत्वों के प्रवेश पर रोक लगाने संबंधी ऐतिहासिक फैसले आये. लेकिन, दुर्भाग्यवश इन फैसलों पर अमल करने के बजाय सरकार ने संसद के जरिये इन्हें खारिज करने का प्रयास किया. हिरासत में लिये गये लोगों के चुनाव लड.ने पर पाबंदी लगानेवाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद में सभी राजनीतिक दलों ने मिल कर निरस्त कर दिया. इसी प्रकार, दो साल से अधिक की सजा पाये जन-प्रप्रतिनिधियों की तत्काल सदस्यता खत्म करने के फैसले को भी संसद के जरिये निरस्त करने की कोशिश की गयी, लेकिन जब इसमें कामयाबी नहीं मिली, तो अध्यादेश के रास्ते दागी जन-प्रप्रतिनिधियों को बचाने का प्रयास किया गया. जब भाजपा और अन्य दलों ने इसका विरोध किया और राष्ट्रपति ने अध्यादेश को लौटाने का संकेत दिया, तो शीला दीक्षित से लेकर मिलिंद देवड.ा जैसे कांग्रेसी नेताओं ने विरोध करने का नाटक शुरू कर दिया. इस फैसले से लोगों में बढ. रहे गुस्से और अध्यादेश पर दस्तखत करने की राष्ट्रपति की अनिच्छा को देखते हुए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी अध्यादेश लाने को गलत ठहरा कर अपनी छवि बेहतर करने की कोशिश की है. राहुल गांधी के विरोध के बाद सरकार शायद अध्यादेश वापस ले ले. लेकिन, सवाल है कि क्या राहुल गांधी को पहले अध्यादेश की जानकारी नहीं थी? ऐसा मानना मुमकिन नहीं है. सरकार के इस फैसले से कांग्रेस के प्रति लोगों में गलत संदेश गया है और इसका राजनीतिक नुकसान आगामी चुनाव में पार्टी को उठाना पड. सकता है.

सुधारों की कड.ी में सुप्रीम कोर्ट ने इवीएम में मतदाताओं को ‘इनमें से कोई नहीं’ का विकल्प देने का आदेश दिया है. यह आदेश महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे निर्वाचन प्रक्रिया में कोई बड.ा बदलाव आने की उम्मीद नहीं की जा सकती है. जमीनी स्तर पर चुनाव सुधार की दिशा में इसका असर नहीं पडे.गा, क्योंकि पहले भी मतदाताओं के पास उम्मीदवारों को खारिज करने का विकल्प था. कोई भी मतदाता पीठासीन अधिकारी से 49(0) फार्म लेकर यह विकल्प आजमा सकता था. अदालत के फैसले के बाद इवीएम मशीन में इसका प्रावधान कर दिया जायेगा, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि राजनीतिक दल मतदाताओं को प्रलोभन देकर मतदान केंद्र तक ले जाते हैं. ऐसे बहुत से मतदाता भी हैं, जो पसंद का उम्मीदवार न होने के कारण मतदान केंद्र पर जाते ही नहीं हैं. लोकतंत्र में चुनाव महत्वपूर्ण होता है और चुनाव किसी को निर्वाचित करने के लिए ही होता है. यह मान लें कि सभी उम्मीदवार दागी हैं और किसी को नहीं चुना जायेगा, तो क्या नतीजा होगा? इससे लोकतंत्र में अराजकता फैल जायेगी. ऐसे में मेरा मानना है कि इस फैसले से चुनाव सुधार की दिशा में खास बदलाव नहीं आयेगा.

जनप्रप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8(4) को रद्द करना ऐतिहासिक फैसला है, क्योंकि पहले दोषी ठहराये जाने और दो वर्ष से ज्यादा सजा होने पर किसी व्यक्ति को चुनाव लड.ने के अयोग्य तो करार दिया जाता था, लेकिन यदि कोई व्यक्ति दोषी ठहराये जाने वक्त संसद या किसी विधानसभा का सदस्य होता था, तो वह तीन महीने के भीतर अपील दायर कर सदन का सदस्य बना रहता था. अब वे ऐसा नहीं कर पायेंगे. लेकिन, यह नहीं समझना चाहिए कि इस एक फैसले से निर्वाचन व्यवस्था की समस्याओं का समाधान हो जायेगा. चुनाव सुधार के लिए कानून बनाने का काम संसद का है, लेकिन देश के राजनेता निहित स्वाथरें के कारण भ्रष्ट व्यवस्था बनाये रखने के पक्षधर हैं. इसकी सबसे बड.ी वजह यह है कि राजनीतिक दलों को अपनी पार्टी चलाने, चुनाव लड.ने के लिए बडे. पैमाने पर पैसे की जरूरत होती है. वे चुनाव जीतने के लिए करोड.ों रुपये खर्च करते हैं. राजनेता और राजनीतिक दल अपने खर्च के लिए ज्ञात व अज्ञात स्रोतों से चंदा लेते हैं. यही कारण है कि जब राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार कानून के दायरे में लाने की कोशिश की गयी, तो इसे भी सभी दलों ने मिल कर नाकाम कर दिया. जब कोई व्यक्ति या संगठन राजनेता और दलों को चंदा देता है, तो उसके बदले वह कई काम कराने की फिराक में रहता है. यहीं से कालेधन और भ्रष्टाचार की शुरुआत होती है. यह जग-जाहिर है कि राजनीति में आपराधिक तत्वों का प्रवेश इसी कारण हुआ है. लगभग 30 फीसदी जनप्रप्रतिनिधि आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं. यह कहना गलत है कि इस फैसले का राजनीतिक दुरुपयोग हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने कानून नहीं बनाया है. उसने केवल कानून के असंवैधानिक पहलू को रेखांकित करते हुए फैसला दिया है. यह काम संसद को करना चाहिए था, लेकिन उल्टे सरकार फैसले को निरस्त करने पर आमादा है .

आज न्यायपालिका इस कारण इतनी सक्रिय नजर आ रही है, क्योंकि विधायिका अपना काम नहीं कर पा रही है. सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों की अपनी अहमियत है, लेकिन बडे. बदलावों के लिए जनता को ही दबाव बनाना होगा. सबसे पहले चुनावों में धनबल के बढ.ते प्रयोग पर रोक लगानी होगी. स्टेट फंडिंग की व्यवस्था से इसे रोका जा सकता है, लेकिन आज लगभग 1,250 राजनीतिक दल पंजीकृत हैं. दलों की भीड. को रोकने के लिए कम से कम आधे राज्यों में 5 फीसदी वोट पाने वाली पार्टी को राष्ट्रीय दल और इससे कम पाने वाली पार्टी को क्षेत्रीय पार्टी माना जाना चाहिए. इसी आधार उन्हें चुनाव लड.ने के लिए सरकारी पैसा दिया जाना चाहिए. यह पैसा नकद में देने के बजाय, सभा करने, पोस्टर, विज्ञापन आदि के लिए छूट के तौर पर दिया जाना चाहिए. साथ ही चुनाव आयोग के पास किसी दल की मान्यता रद्द करने का अधिकार भी होना चाहिए. चुनाव सुधार के लिए सबसे पहले राजनीतिक दलों में अंदरूनी लोकतंत्र की बहाली जरूरी है. यही नहीं उम्मीदवारों के चयन में जनता की भागीदारी होनी चाहिए. एक उम्मीदवार को एक ही क्षेत्र से चुनाव लड.ने की छूट होनी चाहिए. इनके अलावा भी अन्य कई कदम उठाने की जरूरत है. मौजूदा हालात को देखते हुए चुनाव सुधार करना समय की मांग है.


न्यायिक सक्रियता और राजनीति

सुप्रीम कोर्ट के हालिया ऐतिहासिक फैसले

जुलाई महीने की 10 और 11 तारीख को सुप्रीम कोर्ट ने जनप्रप्रतिनिधियों से जुडे. दो अहम मामलों में ऐतिहासिक फैसले दिये थे. 10 जुलाई के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी भी मामले में कोई भी कोर्ट अगर किसी सांसद या विधायक को दो साल से अधिक की सजा सुनाती है, तो उसकी सदस्यता तत्काल प्रभाव से रद्द हो जायेगी. ऊपरी अदालत में अपील के नाम पर उसकी सदस्यता बची नहीं रहेगी. सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को सभी निर्वाचित जनप्रप्रतिनिधियों पर तत्काल प्रभाव से लागू करने का आदेश भी दिया. सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए जनप्रप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (4) को निरस्त कर दिया. कोर्ट ने इन दागी प्रत्याशियों को एक राहत यह जरूर दी कि अगर सुप्रीम कोर्ट का कोई भी फैसला इनके पक्ष में आयेगा, तो इनकी सदस्यता स्वत: ही वापस हो जायेगी. गौरतलब है कि पहले अपील करने के बाद ऊपरी कोर्ट का फैसला आने तक सदस्यता बनी रहती थी. 11 तारीख को सुनाये एक अन्य फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई शख्स किसी वजह से जेल में बंद है यानी वह वोट देने की स्थिति में नहीं है, तो उसे चुनाव लड.ने का भी अधिकार नहीं होगा. शीर्ष अदालत के इन दो फैसलों के खिलाफ केंद्र सरकार ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की. लेकिन, 04 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी. हालांकि, जेल से चुनाव न लड. पाने के मामले में दायर केंद्र सरकार की ऐसी ही याचिका कोर्ट ने सुनवाई के लिए मंजूर कर ली.

चुनाव सुधार की दिशा में 27 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट का एक और फैसला आया. सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को आदेश दिया कि वह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों और मतपत्रों में प्रत्याशियों की सूची के आखिर में ‘इनमें से कोई नहीं’ का विकल्प मुहैया कराए, ताकि मतदाता चुनाव लड. रहे प्रत्याशियों से असंतुष्ट होने की स्थिति में उन्हें अस्वीकार कर सके.

संसद का रुख

्रपुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद 7 सितंबर को लोकसभा में महज 15 मिनट के भीतर जेल से चुनाव न लड.ने के फैसले को पलट दिया गया. राज्यसभा में जनप्रप्रतिनिधित्व कानून में यह संशोधन 27 अगस्त को ही कर दिया गया था.

अध्यादेश और राजनीति

केंद्रीय कैबिनेट ने 25 तारीख को सुप्रीम कोर्ट के दो साल की सजा के बाद सदस्यता रद्द होने संबंधी फैसले को पलटते हुए नये अध्यादेश को मंजूरी दे दी. अध्यादेश के अनुसार, अगर किसी सांसद या विधायक को किसी आपराधिक मामले में दो साल से ज्यादा की सजा मिलती है, तो भी उसकी सदस्यता नहीं छिनेगी.

अध्यादेश के बाद राजनीति तेज हो गयी. भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के प्रप्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मिल कर अध्यादेश पर हस्ताक्षर न करने की अपील की. इसके बाद खबर आयी कि राष्ट्रपति भी सरकार के इस कदम से नाराज हैं और उन्होंने गृह मंत्री को तलब किया है. सरकार को सबसे बड.ा झटका तब लगा, जब खुद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने 27 सितंबर को तल्ख लहजे में अध्यादेश का विरोध किया. राहुल गांधी ने कहा, ‘इस अध्यादेश के बारे में मेरा यही कहना है कि इसे फाड. कर फेंक देना चाहिए. जहां तक इस अध्यादेश का सवाल है, तो यह बिल्कुल बेतुका है, इसे रोका जाना चाहिए.’

आरटीआइ के दायरे में न आने की कवायद

इसी वर्ष जून में केंद्रीय सूचना आयोग (सीआइसी) ने कहा था कि कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी समेत छह बड.ी राजनीतिक पार्टियां सूचना के अधिकार कानून के दायरे में आती हैं और देश के नागरिक उनसे सूचना मांग सकते हैं. इसके बाद लगभग सभी बडे. दलों ने सर्वदलीय बैठक में सीआइसी के इस फैसले पर ऐतराज जताया. इसके बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एक महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए आरटीआइ कानून में संशोधन विधेयक को मंजूरी दे दी. सरकार संसद के मॉनसून सत्र में इस विधेयक को पेश करने का मन भी बना चुकी थी, लेकिन बाद में विधेयक को स्टैंडिंग कमिटी के पास भेज दिया गया.


दलों में आंतरिक लोकतंत्र जरूरी

नापसंदगी का अधिकार देकर सुप्रीम कोर्ट ने जनता को एक मजबूत हथियार दिया है. इस फैसले को सरकार और चुनाव आयोग किस तरह से और कितनी जल्दी लागू करते हैं, यह देखने वाली बात होगी. वैसे चुनाव आयोग ने यह साफ कर दिया है कि ऐसा करने पर ही हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत होगी.



नाव सुधार एक निरंतर चलनेवाली प्रक्रिया है.यह एक दिन में नहीं किया जा सकता. जनता और नागरिक समाज लंबे अरसे से अपने जनप्रप्रतिनिधियों से चुनाव सुधार की मांग करते रहे हैं. सरकार द्वारा इन आवाजों को तरजीह न दिये जाने के कारण नागरिक समाज के प्रप्रतिनिधियों को सर्वो अदालत का दरवाजा खटखटाने को मजबूर होना पड.ता है. सुप्रीम कोर्ट जनभावना को समझते हुए और संविधान के दायरे में महत्वपूर्ण फैसले देता रहा है. चुनाव आयोग द्वारा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में नापसंदगी का बटन लगाने के आदेश को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए.

चुनाव अभियान या वैसे भी सामान्य बातचीत में अकसर मतदाताओं की यह शिकायत रहती थी चुनाव मैदान में खडे. ज्यादातर प्रत्याशी एक जैसे हैं. इनको वोट देने का कोई मतलब नहीं है. ऐसी भावना के साथ जनता का एक वर्ग मतदान की प्रक्रिया से खुद को दूर रखता है. इसका एक परिणाम मतदान का प्रतिशत कम रहने के तौर पर देखा गया है. अब वैसे मतदाता जिनकी नजर में चुनाव मैदान में राजनीतिक दलों द्वारा उतारा गया कोईभी प्रत्याशी उपयुक्त नहीं है, वे नापसंदगी का बटन दबा कर अपनी राय जाहिर कर सकते हैं. इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इससे राजनीतिक दलों पर बेहतर प्रत्याशी खड.ा करने का दबाव बढे.गा और लोकतंत्र मजबूत होगा.सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को इस दिशा में जरूरी कदम उठाने का निर्देश देते हुए सरकार को भी साफ-साफ कहा है कि इसके लिए जरूरी उपाय करें.

अब अगर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर विचार करें और इसकी भविष्य के संदर्भ में व्याख्या करें, तो इसका मतलब यही हुआ कि अगर नापसंदगी का बटन दबानेवालों की संख्या जीत हासिल करनेवाले उम्मीदवार से ज्यादा होती है, तो विजय मत पानेवाले उम्मीदवार को विजेता घोषित न करते हुए फिर से चुनाव कराने की जरूरत पडे.गी. इसके साथ ही वैसे उम्मीदवारों को चुनावी प्रक्रिया में भागीदारी का मौका नहीं मिलेगा, जिन्हें बहुमत ने नापसंद कर दिया है. 50 फीसदी से ज्यादा वोट प्राप्त करनेवालों को ही विजेता घोषित किया जा सकेगा.

यह कहते हुए कि उम्मीदवार के जीतने की संभावना ज्यादा है, राजनीतिक दल बाहुबलियों, धनपतियों आदि को चुनाव मैदान में उतार देते हैं, भले ही जनता उन्हें पसंद करे या न करे. अब नापसंदगी के अधिकार के जरिये जनता को कम से कम ऐसे उम्मीदवारों को नकारने का मौका मिलेगा. साथ ही राजनीतिक दलों पर साफ-सुथरी छविवाले उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारने का भी दबाव होगा.

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने जनप्रप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8(4) को रद्द कर यह निर्देश दिया था कि जो भी सांसद या विधायक निचली अदालत में दोषी करार दिये जाते हैं, और अगर उन्हें दो साल से ज्यादा की सजा सुनाई जाती है, तो वे चुनाव नहीं लड. सकते. सरकार ने ऐसे जनप्रप्रतिनिधियों को अध्यादेश के जरिये कुछ राहत देने की कोशिश की है, ताकि उनकी सदस्यता बनी रहे. इससे चुनाव सुधार और राजनीतिक सुधार के विषय में सरकार की मंशा स्पष्ट जाहिर हुई. मेरा मानना है कि राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र और उनके लेन-देन को पारदश्री बनाना चुनाव सुधार के लिए बहुत ही जरूरी है.जगदीप छोकर

एडीआर के प्रमुखनापसंदगी का अधिकार देकर सुप्रीम कोर्ट ने जनता को एक मजबूत हथियार दिया है. इस फैसले को सरकार और चुनाव आयोग किस तरह से और कितनी जल्दी लागू करते हैं, यह देखने वाली बात होगी. वैसे चुनाव आयोग ने यह साफ कर दिया है कि ऐसा करने पर ही हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत होगी.

राइट-टू-रिकॉल

जय प्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्र ांति आंदोलन के दौरान 1974 में ही इस अधिकार की मांग की थी. किसी जनप्रप्रतिनिधि के चुनाव क्षेत्र के मतदाता अगर उसके कामकाज से संतुष्ट नहीं होते, तो कार्यकाल पूरा होने से पहले उस जनप्रप्रतिनिधि को वापस बुलाने (रिकॉल) का अधिकार लोगों के पास हो. माना जा रहा है कि इससे जन प्रप्रतिनिधि ज्यादा जवाबदेह और जिम्मेदार बनेंगे.

मौजूदा स्थिति

फिलहाल ऐसे किसी प्रस्ताव पर सरकार या आयोग द्वारा विचार नहीं किया जा रहा है. हालांकि कुछ राज्यों में छोटे स्तर पर पंचायत, जिला परिषद व नगरपालिकाओं में इसे लागू किया जा चुका है.

दलों का रुख

भाजपा की एक कमिटी चुनाव सुधार को लेकर विचार कर रही है. कांग्रेस इसे व्यावहारिक नहीं मानती. जबकि माकपा इसे ेलागू करने की पक्षधर है.

अन्य देशों में स्थिति

स्विट्जरलैंड और वेनेजुएला में लागू है राइट-टू-रिकॉल.

सरकारी फंड

चुनाव लड.ने के लिए अगर सरकार राजनीतिक पार्टियों को पैसा दे, तो कुछ जानकारों का मानना है कि चुनावों में पैसे का दखल कम हो सकता है. इससे कम पैसे वाले लोग भी चुनाव लड. पायेंगे.

मौजूदा स्थिति

जून, 1998 में माकपा के इंद्रजीत गुप्ता की अगुवाई में एक संसदीय समिति बनी थी. कमिटी में मनमोहन सिंह, सोमनाथ चटर्जी, विजय कुमार मल्होत्रा आदि शामिल थे. कमिटी ने राजनीतिक दलों के लिए सरकारी फंडिंग की सिफारिश की थी. ये सिफारिशें सिर्फ राष्ट्रीय या राज्य स्तर की पार्टियों और उनके उम्मीदवारों के लिए ही थीं. अभी तक इस बारे में कोई नियम नहीं बना है.

दलों का रुख

अधिकतर इसके सर्मथन में हैं.

अन्य देशोें में

कई यूरोपीय, दक्षिण अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों में चुनाव लड.ने के लिए पैसा वहां की सरकारें देती हैं.

चुनाव सुधारों का सफर


देश में चुनाव सुधारों को लेकर कई दशकों से बहस जारी है. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने 10 फरवरी, 1992 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव को एक पत्र लिख कर चुनाव सुधार पर मई, 1990 में पेश पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री दिनेश गोस्वामी समिति की रिपोर्ट को लागू करने की सिफारिश की थी. ऐसा नहीं है कि यह चुनाव सुधार के लिए पहली रिपोर्ट थी, इससे पहले भी इस कार्य हेतु कई रिपोर्ट आ चुकी हैं. चुनाव आयोग ने 1970 में विधि मंत्रालय को चुनाव सुधार से संबंधित अपना पहला विस्तृत प्रस्ताव प्रारूप सहित भेजा था. 1975 में माकपा, जनसंघ, अत्राद्रमुक आदि दलों की संयुक्त समिति ने अनेक सुझाव दिये. 1975 में आठ दलों ने एक स्मार पत्र (मेमोरेंडम) दिया, जिसमें कई सुझाव दिये गये थे. जेपी नारायण ने प्रसिद्ध न्यायविद् वीएम तारकुंडे की अध्यक्षता में चुनाव सुधार पर विचार के लिए एक कमेटी गठित की थी. चुनाव आयोग ने 1977 में पूर्व के सभी सुधारों से संबंधित प्रस्तावों की समीक्षा कर 22 अक्टूबर, 1977 को एक समग्र प्रतिवेदन भारत सरकार को भेजा था. 1982 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एसएल शकधर ने पूर्व के सभी सुझावों की समीक्षा के बाद एक नया प्रस्ताव भारत सरकार को भेजा. इस तरह लगातार इस संबंध में सुझाव आयोग द्वारा भारत सरकार को भेजे जाते रहे हैं, जिनमें कुछ पर ही अमल हो पाया. पिछले दिनों समाजसेवी अत्रा हजारे आंदोलन के जरिये कई चुनाव सुधारों को अमल में लाने की अपील की गयी, लेकिन सरकार या राजनीतिक दलों ने अपनी तरफ से कोईकदम नहीं उठाया. अलबत्ता सुप्रीम कोर्ट ने विभित्र याचिकाओं पर सुनवाईकरते हुए पिछले दिनों तीन अहम आदेश पारित किये.

Yes to the no-vote option

Yes to the no-vote option

By ordering that voting machines in future should have an additional provision for voters to record a ‘none-of-the-above’ (NOTA) option to reject all candidates in the fray, the Supreme Court has ushered in a key electoral reform that has found favour in the past with the Election Commission of India and even the Law Commission. The idea of according to a negative vote the same sanctity and secrecy as a vote in favour of a particular candidate is indeed laudable in a parliamentary democracy. Advocates of electoral reforms have encouraged voters to make greater use of Rule 49-O, the provision by which one can record a ‘no-vote’ option by signing a form in the presence of election officials, in the hope that a large number of such negative votes would induce political parties to field candidates known for their integrity. The verdict holds that the rule violates election law and the voters’ freedom of expression alike by denying voters who exercise that choice the required secrecy. The Court believes that the extra provision in the voting machines would promote free and fair elections, ensure greater voter participation and reduce bogus voting.

In recent times, the Supreme Court has struck down a provision to prevent immediate disqualification of convicted legislators and, more controversially, barred those in custody from contesting elections. The NOTA ruling fills a significant lacuna in electoral law, and is a welcome addition to the series of decisions it has rendered to protect the integrity of our elections. A doubt arises as to what will happen if a very large percentage of voters go in for the no-vote option. Even a meagre turnout is considered good enough to declare a valid result now, but a heavy quantum of negative votes may affect the legitimacy of the election process. Perhaps, the EC could fix a limit beyond which the percentage of NOTA votes would entail re-polling. All this raises a question: why has Parliament left electoral reforms to the courts instead of deliberating over and passing appropriate laws? Thanks to an assertive EC, the potential for irregularities by the political class has been effectively kept under check, but this inherently adversarial relationship may have prevented the ushering in of sweeping reforms through legislation. There is no agreement on some reforms mooted by the Election Commission, such as making the framing of charges in serious criminal cases the basis for disqualification instead of conviction. Ranging from the need to check money power and paid news to the need for transparency in the funding of political parties, there are a host of issues that ought to be addressed through comprehensive legislation rather than ad hoc adjudication.

Sunday, September 15, 2013

रीयल एस्‍टेट (विनियमन और विकास) विधेयक, 2013

रीयल एस्‍टेट (विनियमन और विकास) विधेयक, 2013 प्र1. रीयल एस्‍टेट क्षेत्र के विनियमन की ज़रूरत क्‍यों है ? उ. रीयल एस्‍टेट क्षेत्र देश में आवासीय और अवसंरचना की ज़रूरत और मांग को पूरा करने में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा करता है। हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में उल्‍लेखनीय वृद्धि हुई है लेकिन व्‍यावसायिकता और मानकीकरण नहीं होने तथा उपभोक्‍ता को पर्याप्‍त संरक्षण देने में कमी के कारण यह मुख्‍य रूप से अनियंत्रित क्षेत्र रहा है जिसने इस उद्योग की स्‍वस्‍थ्‍ा और व्‍यवस्थित वृ‍द्धि को अवरूद्ध किया है। साथ ही इस क्षेत्र के विनियमन पर विभिन्‍न मंचों, फोरम तथा मीडियों रिपोर्टों में ज़ोर दिया गया है। हाल के समय में उपभोक्‍ता कार्य मंत्रालय, प्रतिस्‍पर्धा आयोग तथा टैरिफ आयोग ने भी इसके विनियमन के लिए बार-बार कहा है। प्र2. इस विधेयक के सबसे महत्‍वपूर्ण प्रावधान क्‍या हैं? उ. प्रस्‍तावित विधेयक रिहायशी रीयल एस्‍टेट यानी आवास तथा कोई अन्‍य आनुषांगिक आवासीय के स्‍वतंत्र उपयोग पर लागू होता है। हालांकि यह समझना जरूरी है कि इस विधेयक के तहत केवल ‘लेन-देन’ यानी रिहायशी रीयल एस्‍टेट को खरीदने तथा बेचने के कार्य को ही विनियमित करना है न कि ‘निर्माण कार्य’ को जो कि राज्‍यों/यूएलबी का अधिकार है। इस विधेयक का उद्देश्‍य इस क्षेत्र में पारदर्शिता लाना है। इसमें प्रमोटर के उल्लिखित कामकाज तथा कार्यों के साथ परियोजना की सभी जानकारी को अनिवार्य रूप से सार्वजनिक करने का प्रावधान है। इस विधेयक में त्‍वरित विवाद निवारण व्‍यवस्‍था के लिए रीयल एस्‍टेट प्राधिकरण और अपीलीय न्‍यायाधिकरण की स्‍थापना का प्रावधान है। इसके प्रावधानों में से एक स्‍पष्‍ट उत्‍तरदायित्‍वों और कामकाजों के साथ रीयल एस्‍टेट एजेंटों का रजिस्‍ट्रेशन करना है जिन पर अभी तक नियंत्रण नहीं था। इससे दो पक्षों के बीच लेन-देन का प्रमाण मिलेगा तथा मनी लांड्रिंग पर काबू पाया जा सकेगा। सभी विनियामक विधेयकों के जैसे विधेयक के प्रावधानों का अनुपालन नहीं करना तथा उसे लागू न करने पर दंडात्‍मक प्रावधान भी हैं। दंडात्‍मक प्रावधानों के तहत परियोजना का रजिस्‍ट्रेशन रद्द करना तथा प्राधिकरण या न्‍यायाधिकरण के आदेशों या विधेयक के प्रावधानों का उल्‍लंघन करने पर जुर्माना लगना भी शामिल है। प्र3. कुछ लोग इसे लोकवादी कदम बता रहे हैं, रीयल एस्‍टेट के संगठन क्रेडाई (सीआरईडीएआई) ने कहा है कि प्रस्‍तावित कानून के ज़रिए केवल डेव्‍लपर्ज़ को ही नहीं बल्कि उद्योग के सभी हितधारकों को शासित किया जाना चाहिए ? उ. टेलीकॉम, प्रतिभूमि, बीमा, बिजली आदि की तर्ज पर रीयल एस्‍टेट के क्षेत्र में भी विनियामक की काफी ज़रूरत है। इस क्षेत्र में विनियामक सूचकांक में भारत का स्‍थान काफी नीचे है। इसमें घरेलू और विदेशी निवेश होने पर गतिविधियां बढ़ाने के साथ सकल घरेलू उत्‍पाद में वृद्धि की जा सकती थी। प्रस्‍तावित विधेयक में इस क्षेत्र में ‘लेन-देन’ को विनियमित किया गया है तथा ‘लेन-देन’ में शामिल सभी हितधारकों यानी प्रोमोटरों/विक्रेता, आवंटी/खरीदार तथा रीयल एस्‍टेट एजेंट को उल्लिखित कामकाज और कार्य के साथ विनियमित किया गया है। इस विधेयक में ‘निर्माण कार्य’ पर विनियमन नहीं है। यह राज्‍यों/यूएलबी का अधिकार है। डेव्लपर्ज़ की मुख्‍य चिंता परियोजना संबंधी मंज़ूरी के मामले में एक ही जगह सुविधा की ज़रूरत है। इसके लिए मेरे मंत्रालय ने एक विशेषज्ञ समिति गठित की है जिसमें उद्योग संगठनों के प्रतिनिधि भी होंगे जो राज्‍यों को ऐसी व्‍यवस्‍था लागू करने की सिफारिश करेंगे। ज‍हां तक रीयल एस्‍टेट विधेयक का सवाल है इसका दायरा केवल लेन-देन को देखना हैा अत: यह इसमें शामिल सभी पक्षों को विनियमित करता है। प्र4. रीयल एस्‍टेट नियामक विधेयक के तहत इस क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही लाना है, लेकिन ऐसा दावा किया जा रहा है कि संसद में इस विधेयक के पारित हो जाने से कीमतें 30 प्रतिशत तक बढ़ेंगी ? उ. यह सच नहीं है और ऐसे अनुमान न जाने कहां से लगाए गए हैं। विधेयक का उद्देश्‍य सूचना के आदान-प्रदान के लिए ऑनलाइन व्‍यवस्‍था बनाकर उपभोक्‍ता का संरक्षण करना है ताकि डेव्‍लवर्ज़ और खरीदारों के बीच आपसी विश्‍वास हो और परियोजनाओं को समय पर लागू किया जा सके। इस विधेयक के लागू होने से इस क्षेत्र में गतिविधि बढ़ेगी जिससे बाज़ार में और अधिक आवासीय इकाइयां आएंगी। इससे निवेश के लिए ज़रूरी विश्‍वास पैदा होगा तथा बेचे जा रहे घरों की कीमतों में स्थिरता आएगी। इस विधेयक का उद्देश्‍य उपभोक्‍ताओं और प्रोमोटरों को फायदा पहुंचाने के साथ समग्र रूप से इस क्षेत्र को लाभ पहुंचाना है। प्र5. सरकारी एजेंसियों से मंज़ूरी मिलने के कारण देरी। केवल रिहायशी परियोजनाओं का ही नियमन क्‍यों तथा व्‍यावसायिक रीयल एस्‍टेट को इसके तहत क्‍यों नहीं लाया गया? उ. सरकारी एजेंसियों से मंज़ूरी मिलने के कारण देरी होने के मुद्दे पर आवास और शहरी गरीबी उन्‍मूलन मंत्रालय सभी राज्‍यों को परियोजनाओं की मंज़ूरी के लिए एक ही जगह सुविधा उपलब्‍ध कराने की व्‍यवस्‍था अपनाने की सलाह दे रहा है जो विधेयक के प्रावधानों में शामिल नहीं है और यह एक अलग कार्य है। एक बिंदू जिसे अक्‍सर छोड दिया जाता है कि प्रस्‍तावित विधेयक के तहत केवल रिहायशी रीयल एस्‍टेट की बिक्री का नियमन होगा और न कि उसे विकसित करने का। प्रमोटर विकास कार्य करने के लिए स्‍वतंत्र हैं लेकिन इस विधेयक के तहत जो प्रावधान है कि वह उसे तभी बेच सकता है जब उसके पास हर तरह से मंज़ूरी हो और उसने इस विधेयक के तहत विनियामक के पास परियोजना का पंजीकरण कराया हो। विधेयक का दायरा रिहायशी संपत्तियों तक सीमित रखने से विनियामक का इस पर पूरा ध्‍यान रहेगा तथा इसमें उपभोक्‍ताओं की ज़रूरत पर भी गौर किया जाएगा। प्र6. जो परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं या उसमें निर्माण कार्य चल रहा है, 4000 वर्ग मीटर से कम की परियोजनाओं के लिए विनियामक के पास पंजीकरण कराना अनिवार्य नहीं है। तो अनेक छोटे डेव्‍लपर्ज पंजीकरण तथा नियमन के नियंत्रण में नहीं आएंगे? उ. प्रारंभिक मसौदे में 4000 वर्ग मीटर का प्रावधान था जिसे राज्‍यों और अन्‍य हितधारकों के साथ विचार-विमर्श के बाद घटाकर 1000 वर्ग मीटर या 12 अपार्टमेंट कर दिया गया है (जो भी लागू हो)। साथ ही यह विधेयक विशेष रूप से प्रत्‍याशित विनियमन होगा। प्र7. वास्‍तविक कार्पेट एरिया का उल्‍लेख करना अनिवार्य हो गया है, डेव्‍लर्ज सुपर बिल्‍ट एरियों के आधार पर फ्लैट बेच रहे हैं जिसमें आने-जाने के लिए सामान्‍य रस्‍ता, सीढियां तथा अन्‍य क्षेत्र शामिल है यानी वास्‍तविक फ्लैट एरिया से 20-30 प्रतिशत अधिक? उ. विधेयक के अनुसार प्रमोटरों को, बिक्री के लिए अपार्टमेंट की संख्‍या कार्पेट एरिया के आधार पर बतानी होगी। कार्पेट एरिया को परिभाषित किया गया है। खरीदार को मालूम होना चाहिए कि वो वास्‍तव में किसके लिए भुगतान कर रहा है और उसे क्‍या मिल रहा है। सुपर बिल्‍ट आदि जैसे विषय भ्रमित करने वाले है और विधेयक का उद्देश्‍य आवश्‍यकताओं का मानकीकरण करना है। इससे रीयल एस्‍टेट में लेन-देन में व्‍याप्‍त विषमताओं में कमी आएगी। रीयल एस्‍टेट विधेयक, 2013 में रीयल एस्‍टेट और आवासीय लेनदेन में पारदर्शिता, निष्‍पक्षता और नीतिपरक व्‍यावसायिक प्रणाली को बढ़ावा रीयल एस्‍टेट (विनियमन और विकास) विधेयक 2013 में लेनदेन के संबंध में पारदर्शिता, निष्‍पक्षता और नीतिपरक व्‍यावसायिक कार्यप्रणाली को बढ़ावा देने, परियोजना के विवरण का खुलासा और परियोजना तथा खरीदार के संबंध में अनुबंधों की कानूनी बाध्‍यताओं का विशेष रूप से प्रावधान किया गया है जिसमें खरीदारों के लिए पूरी जानकारी के साथ चयन की व्‍यवस्‍था की गई है। परियोजना के विवरण की जानकारी देने से रीयल एस्‍टेट संबंधी लेनदेन में व्‍याप्‍त विषमताओं को दूर करने में मदद मिलेगी। इस समय रीयल एस्‍टेट और आवास क्षेत्र काफी हद तक अनियंत्रित और अस्‍पष्‍ट है, जिससे उपभोक्‍ताओं को अक्‍सर इस संबंध में पूरी जानकारी नहीं मिल पाती, अथवा प्रभावकारी नियमों के अभाव में बिल्‍डरों और डेवलपरों की जवाबदेही तय नहीं हो पाती। उम्‍मीद है कि यह विधेयक उपभोक्‍ताओं के प्रति अधिक जवाबदेही तय करेगा और जालसाजी और परियोजना के पूरा होने में होने वाली देरी में पर्याप्‍त कमी लायेगा। इस विधेयक का उद्देश्य रीयल एस्‍टेट और आवास से जुड़े लेन-देन में पारदर्शिता लाने के साथ ही जवाबेदही तय करके आम जनता का विश्‍वास बहाल करना है जिससे इस क्षेत्र की पूंजी और वित्‍तीय बाजारों तक पहुंच हो सकेगी जो इसकी दीर्घकालिक वृद्धि के लिए अनिवार्य है। परियोजना के बारे में विस्‍तृत प्रावधान इस प्रकार है:- प्राधिकार को आवेदन अनुच्‍छेद 4 (1): प्रत्‍येक प्रमोटर रीयल एस्‍टेट परियोजना के पंजीकरण के लिए प्राधिकार में आवेदन कर सकता है। यह आवेदन प्राधिकार द्वारा बनाए गए नियमों के भीतर होगा। (2) प्रमोटर को उप-अनुच्‍छेद (1) में उल्‍लेखित आवेदन के साथ निम्‍नलिखित दस्‍तावेजों को लगाना होगा:- (क) अपने उद्यम का संक्षिप्‍त ब्‍यौरा जिसमें उसका नाम, पंजीकृत पता, उद्यम का प्रकार (स्‍वामित्‍व, सोसायटी, साझेदारी, कम्‍पनियां, सक्षम अधिकारी) और पंजीकरण का ब्‍यौरा शामिल है; (ख) आवेदन में उल्लिखित रीयल एस्‍टेट परियोजना के लिए लागू कानूनों के अनुसार सक्षम अधिकारी से प्राप्त परियोजना के आरंभ होने के संदर्भ में प्रमाण पत्र की प्रमाणित प्रति जो रीयल एस्‍टेट परियोजना पर लागू होती है, और इस परियोजना को विभिन्‍न चरणों में कहां-कहां आगे बढ़ाया जाएगा, इसका आवेदन में जिक्र हो। इस तरह के प्रत्‍येक चरण के लिए सक्षम अधिकारी की मंजूरी की प्रमाणित प्रति; (ग) प्रस्‍तावित परियोजना अथवा चरण का खाका और साथ ही सक्षम अधिकारी द्वारा मंजूर संपूर्ण परियोजना का नक्‍शा; (घ) प्रस्‍तावित परियोजना के लिए किए जाने वाले विकास कार्यों की योजना और उसके बाद दी जाने वाली प्रस्‍तावित सुविधाएं; (ड.) एलाटमेंट पाने वालों के साथ हस्‍ताक्षर किए जाने वाले प्रस्‍तावित समझौतों का प्रारूप; (च) परियोजना में बिक्री वाले अपार्टमेंटों की संख्‍या और कारपेट एरिया; (छ) प्रस्‍तावित परियोजना के लिए रीयल एस्‍टेट एजेंट का नाम और पता, यदि कोई है; (ज) ठेकेदार, वास्‍तुकार, ढांचा इंजीनियर, यदि कोई हो और प्रस्‍तावित परियोजना के विकास से जुड़े अन्‍य व्‍यक्तियों के नाम और पते; (झ) एक हलफनामे के साथ घोषणापत्र, जिसमें प्रमोटर अथवा प्रमोटर द्वारा अधिकृत किसी व्‍यक्ति के हस्‍ताक्षर हों, जिसमें कहा गया हो- (1) कि जिस भूमि पर विकास प्रस्‍तावित है, उस पर उसे कानूनी अधिकार प्राप्‍त है। इसके साथ ही इस जमीन का स्‍वामित्‍व किसी अन्‍य व्‍यक्ति के पास रहता है तो भी उसे कानूनी अधिकार प्राप्‍त है। (2) कि भूमि सभी तरह की बाधाओं से मुक्‍त है अथवा इस तरह की जमीन पर अधिकारों, शीर्षक, दिलचस्‍पी अथवा किसी पक्ष का नाम सहित किसी प्रकार की बाधा नहीं है; (3) व‍ह अवधि जिसके भीतर कोई भी व्‍यक्ति परियोजना अथवा चरण को पूरा करने का वचन लेता है; (4) कि एक योग्य सरकार की समय-समय पर जारी अधिसूचना के अनुसार प्रमोटर को रीयल एस्‍टेट परियोजना के लिए तय राशि का 70 प्रतिशत अथवा उससे कम प्रतिशत की परियोजना राशि, वसूली के 15 दिन के भीतर एक अलग खाते में जमा करानी होगी जिसे निर्माण की लागत को पूरा करने के लिए एक अनुसूचित बैंक में रखा जायेगा और इस राशि का इस्‍तेमाल इसी कार्य के लिए किया जाएगा। व्याख्‍या – इस खंड के लिए ‘’अनुसूचित बैंक’’ का अर्थ है ऐसा बैंक जिसे भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की दूसरी अनुसूची में शामिल किया गया है; (5) कि उसने वह दस्‍तावेज जमा कराए हैं जिनका इस अधिनियम के अंतर्गत बनाए गए नियमों और शर्तों में उल्‍लेख किया गया है; और (6) इस तरह की कोई अन्‍य सूचना और दस्‍तावेज प्रमोटर के कार्य और कर्तव्‍य अनुच्‍छेद 11. (1) : प्रमोटर (क) अनुच्‍छेद 5 के उप-अनुच्‍छेद (1) अथवा अनुच्‍छेद 5 के उप-अनुच्‍छेद (2) के अंतर्गत अपना लॉग-इन और पासवर्ड प्राप्‍त करने पर प्राधिकरण की वेबसाइट पर अपना वेब-पेज बना सकता है और अनुच्‍छेद 4 के उप-अनुच्‍छेद (2) के अंतर्गत प्रदान की गई सभी जानकारियों को प्रस्‍तावित परियोजना में डाल सकता है-जिसमें शामिल है- (क) प्राधिकार द्वारा दिया गया पंजीकरण का विवरण; (ख) बुक किए गए अपार्टमेंटों अथवा प्‍लाटों की संख्‍या और प्रकार की संपूर्ण अद्यतन सूची प्रत्‍येक तिमाही पर; (ग) परियोजना की अद्यतन स्थिति के बारे में तिमाही जानकारी और; (घ) प्राधिकार द्वारा बनाए गए नियमों में दी गई इस तरह की अन्य सूचना और दस्‍तावेज (2) प्रमोटर द्वारा जारी अथवा प्रकाशित विज्ञापन अथवा विवरणिका में प्राधिकार की वेबसाईट का पता साफ-साफ हो, जबकि पंजीकरण परियोजना के सभी विवरणों को शामिल किया जाए तथा प्राधिकार से प्राप्‍त पंजीकरण संख्‍या और इस तरह के अन्‍य मामलों को शामिल किया जाए। (3) एलॉटमेंट पाने वाले के साथ बिक्री संबंधी समझौता करते समय प्रमोटर को एलॉटमेंट पाने वाले को निम्‍नलिखित जानकारी उपलब्‍ध करानी होगी:- (क) प्राधिकार द्वारा बनाए गए निर्दिष्‍ट नियमों के अनुसार सक्षम अधिकारियों द्वारा मंजूर स्‍थान और नक्‍शे की योजनाओं को विर्निदेशों के साथ जगह पर अथवा इस तरह के अन्‍य स्‍थानों पर लगाया जाए। (ख) पानी, स्‍वच्‍छता और बिजली के प्रावधानों सहित परियोजना के पूरा होने की चरणवार समय-सारिणी (4) प्रमोटर को- (क) उचित सक्षम अधिकारी से स्‍थानीय कानूनों अथवा अन्‍य कानूनों के अनुसार कम्‍प्‍लीशन सर्टिफिकेट लेना होगा और इसे एलॉटमेंट पाने वालों को अलग-अलग अथवा एलॉटमेंट पाने वालों के सहयोगियों को उपलब्‍ध कराना होगा, जैसी भी स्थिति हो; (ख) प्रमोटर आवश्‍यक सेवाएं प्रदान करने और उनके रख-रखाव के लिए जिम्‍मेदार होगा जैसा कि सेवा स्‍तर के समझौतों में निर्दिष्‍ट किया गया है; (ग) एलॉटमेंट पाने वालों, उनके किसी फेडरेशन के मामले में एक एसोसिएशन अथवा सोसायटी अथवा सहकारी सोसायटी के गठन के लिए कदम उठाए। (5) प्रमोटर बिक्री समझौते की शर्तों में केवल एलॉटमेंट रद्द कर सकता है: बशर्ते एलॉटमेंट पाने वाला राहत के लिए अधिकारी के पास जाए, अगर वह रद्द करने की इस तरह की प्रक्रिया से असंतुष्‍ट है और यह प्रक्रिया बिक्री के अनुसार, एकतरफा और बिना किसी पर्याप्‍त कारण के है। (6) प्रमोटर प्राधिकार द्वारा बनाए गए समय-समय पर अन्‍य तरह के विवरण तैयार करें और उनकी संभालें।

Tuesday, September 10, 2013

स्‍ट्रीट वेंडर्स (जीविका सुरक्षा तथा स्‍ट्रीट वेंडिंग विनियम) विधेयक 2012

स्‍ट्रीट वेंडर्स (जीविका सुरक्षा तथा स्‍ट्रीट वेंडिंग विनियम) विधेयक 2012 प्रश्‍न-1 स्‍ट्रीट वेंडर्स (जीविका सुरक्षा तथा स्‍ट्रीट वेंडिंग विनियम) विधेयक 2012 क्‍यों आवश्‍यक है, जिसे लोकसभा ने हाल ही सम्‍पन्‍न सत्र में पारित किया है? उत्तर- स्‍ट्रीट वेंडर्स शहरी अर्थव्‍यवस्‍था का अभिन्‍न अंग हैं। स्‍ट्रीट वेंडिंग न केवल शहरों और कस्बों में गरीबों के वास्ते स्‍व-रोजगार का जरिया है, बल्कि ज्यादातर शहरी आबादी, विशेषकर आम आदमी को किफायती और सुविधाजनक सेवाएं प्रदान करने का साधन भी है। स्‍ट्रीट वेंडर्स अक्सर वे लोग होते हैं जो औपचारिक क्षेत्र में नियमित काम पाने में सक्षम नहीं हो पाते और वे अपनी जीविका की समस्‍या मामूली वित्‍तीय संसाधन और परिश्रम से दूर करने की कोशिश करते हैं। शहरी समाज में रेहड़ी-पटरी वालों के महत्वपूर्ण योगदान विशेषकर, तुलनात्‍मक रूप से समाज के गरीब वर्गों के प्रति योगदान पर गौर करते हुए तथा काम का सम्मानजनक माहौल बना कर उनको सम्मानित ढंग से आजीविका कमाने में समर्थ बनाने के लिए भारत सरकार ने एक विधेयक की पेशकश की, जो देश में स्ट्रीट वेंडर्स के जीविका के अधिकार की रक्षा और उनकी सामाजिक सुरक्षा का प्रावधान प्रस्तुत करता है। प्रश्न-2 विधेयक के मुख्य प्रावधान क्या हैं? उत्तर- विधेयक में सभी वर्तमान स्‍ट्रीट वेंडरों के सर्वेक्षण और उसके बाद प्रत्‍येक पांच वर्ष में कम से कम एक बार पुनर्सर्वेक्षण का प्रावधान है और विधेयक में यह व्‍यवस्‍था है कि सर्वे पूरा होने तथा स्‍ट्रीट वेंडरों को प्रमाणपत्र जारी होने तक किसी भी स्‍ट्रीट वेंडर को उस स्‍थान से हटाया या पुनर्स्‍थापित नहीं किया जाएगा। विधेयक में स्‍ट्रीट वेंडर्स को प्रताड़णा से बचाने तथा उनकी जीविका को बढ़ावा देने का उपाय कर सबको शामिल किया गया है। प्रश्न-3 क्या विधेयक स्ट्रीट वेंडर्स को पुलिस और नगर प्रशासन की प्रताड़णा से संरक्षण प्रदान करता है? उत्तर- हां, इस विधेयक में स्ट्रीट वेंडर्स को पुलिस और अन्य विभागों की प्रतारणा से बचाने के लिए विशेष अनुच्छेद का प्रावधान किया गया है। विधेयक का एक खंड विशेष रूप से निम्नलिखित प्रावधान करता है: “किसी अन्य कानून के लागू होने के बावजूद अपने वेंडिंग प्रमाण पत्र में दी गई शर्तों के अनुरूप स्ट्रीट वेंडिंग की गतिविधियां चलाने वाले किसी भी स्ट्रीट वेंडर को, किसी व्यक्ति अथवा पुलिस अथवा किसी अन्य विभाग द्वारा उस समय लागू किसी अन्य कानून के तहत प्राप्त अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए उसकी गतिविधियां चलाने के अधिकार से वंचित नहीं रखा जा सकेगा।” प्रश्न-4 कार्यान्वयन प्राधिकरण टाउन वेंडिंग कमेटी है। क्या टाउन वेंडिंग कमेटी के फैसलों पर दाखिल की जाने वाली अपीलों की सुनवाई के लिए कोई शिकायत निवारण तंत्र है, मिसाल के तौर पर अगर किसी स्ट्रीट वेंडर को वेंडिंग का प्रमाण पत्र देने से इंकार कर दिया जाए तो वह कहां गुहार लगाएगा? उत्तर- यह विधेयक गैर-न्यायिक शिकायत निवारण तंत्र का प्रावधान करता है। टाउन वेंडिंग कमेटी के किसी स्ट्रीट वेंडर को वेंडिंग का प्रमाण पत्र जारी करने से इंकार करने अथवा कानून के प्रावधानों के तहत प्रमाण पत्र रद्द या निलंबित करने के फैसले के विरूद्ध पीड़ित स्थानीय प्राधिकरण को अपील कर सकता है। प्रश्न-5 इस विधेयक का शीर्षक स्ट्रीट वेंडर्स (जीविका सुरक्षा तथा स्ट्रीट वेंडिंग विनियम) विधेयक है। क्या यह विधेयक समाज के प्रति स्ट्रीट वेंडर्स के दायित्वों का प्रावधान करता है? उत्तर- हां, यह विधेयक स्ट्रीट वेंडर्स के विशिष्ट दायित्वों और कर्तव्यों का प्रावधान करता है। स्ट्रीट वेंडर्स को अपने वेंडिंग क्षेत्र में तथा उसके आसपास की जगह साफसफाई और सार्वजनिक स्वच्छता का ध्यान रखना चाहिए, ताकि उसके वेंडिंग जोन की नागरिक सुविधाएं और सार्वजनिक सम्पत्ति अच्छी हालत में रहे और उन्हें किसी तरह का नुकसान और हानि न पहुंचे, वे रख-रखाव संबंधी शुल्क का भुगतान करें, नो-वेंडिंग जोन्स में वेंडिंग गतिविधियां न करें आदि। ये विधेयक स्ट्रीट वेंडर्स की जीविका के अधिकारों की रक्षा करने के साथ-साथ लोगों का बिना किसी रूकावट के सड़कों पर आसानी से चलने का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए भी उचित नियोजन उपायों का प्रावधान करता है। प्रश्न-6 क्या यह विधेयक स्ट्रीट वेंडर्स के साजो-सामान और वस्तुओं को नुकसान से बचाता है, क्योंकि अक्सर ऐसा देखा गया है कि अधिकारी उनका सामान जब्त कर लेते हैं और स्ट्रीट वेंडर्स को उसे छुड़ाने के लिए एक जगह से दूसरी जगह भागना पड़ता है। खराब होने वाली वस्तुओं के मामलें में, अगर वे समय पर न लौटाई जाएं तो वे बरबाद हो जाती हैं और स्ट्रीट वेंडर्स को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। उत्तर- आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय स्ट्रीट वेंडर्स को होने वाली इस परेशानी से अवगत है दरअसल हमें इस बारे में स्ट्रीट वेंडिंग समुदाय से कई ज्ञापन मिले हैं जिसमें उन्होंने वस्तुओं के जब्त होने और उन्हें छुड़ाने से संबंधित विशिष्ट प्रावधानों की जरूरत उजागर की है। वस्तुओं को जब्त किए जाने को आखिरी कार्रवाई बनाने, इतना ही नहीं स्थानीय अधिकारियों की ओर से स्ट्रीट वेंडर को 30 दिन का नोटिस भेजे जाने के बाद ही ऐसा करने का प्रावधान किया गया है। विधेयक में विशेषतौर पर इस बात का प्रावधान किया गया है कि अगर वस्तुओं को जब्त किया जाए, तो उन वस्तुओं की सूची तैयार की जानी चाहिए और वस्तुओं को जब्त करने के लिए अधिकृत व्यक्ति के हस्ताक्षर वाली उसकी एक प्रति स्ट्रीट वेंडर को जारी की जानी चाहिए। इस प्रकार स्ट्रीट वेंडर को उचित जुर्माना चुकाने के बाद उन वस्तुओं को वापस पाने का अधिकार है। इस विधेयक में खराब न होने वाली वस्तुओं के लिए भी यह प्रावधान है कि स्थानीय अधिकारी को स्ट्रीट वेंडर द्वारा दावा पेश किये जाने के 2 कार्य दिवसों के भीतर उन वस्तुओं को छोड़ना होगा। खराब होने वाली वस्तुओं के मामले में स्थानीय अधिकारी को स्ट्रीट वेंडर द्वारा दावा किए जाने वाले दिन ही वस्तुओं को छोड़ना होगा। इस प्रकार यह विधेयक वस्तुओं के जब्त होने के मामले में स्ट्रीट वेंडर्स को उचित संरक्षण प्रदान करता है।

Friday, September 6, 2013

The Securities Laws (Amendment) Bill, 2013

The Securities Laws (Amendment) Bill, 2013 The Securities Laws (Amendment) Bill, 2013 was introduced in the Lok Sabha on August 12, 2013, replacing the Securities Laws (Amendment) Ordinance 2013. The Bill amends the Securities and Exchange Board of India Act, 1992 (the SEBI Act, 1992), the Securities Contract (Regulation) Act, 1956 (SCRA, 1956) and the Depositories Act, 1996. Definition of Collective Investment Scheme (CIS): The SEBI Act, 1992 defines a CIS as a scheme which meets four conditions: funds of investors are pooled, yields profits or income, is managed on behalf of investors and investors do not have operational or managerial control. Additionally, the Act exempts certain types of investments which are regulated by other authorities. The Bill widens the definition of a CIS by introducing a proviso which deems any scheme or arrangement to be a CIS if it meets three conditions: (a) funds are pooled, (b) it is not registered with SEBI, or it is not exempted by SEBI Act, 1992 and (c) it has a corpus of Rs 100 crore or more. In addition, the Bill delegates power to SEBI to specify the conditions under which any scheme or arrangement can be defined as a CIS. The Bill permits the central government to add any scheme or arrangement to the list of excluded schemes, in consultation with SEBI. Disgorgement (repayment) of unfair gains/averted losses: SEBI has, in the past, issued orders directing market participants to refund the profits or compensate other participants for losses resulting from their unfair actions. The SEBI Act, 1992 does not contain a specific provision regarding power to order disgorgement. The Bill deems SEBI to have always had this power. A similar explanation has been added to the SCRA, 1956 and the Depositories Act, 1996. The Bill specifies that the disgorged amount shall be credited to the Investor Education and Protection Fund (IEPF), and shall be used in accordance with SEBI regulations. Investigation and prosecution: The SEBI Act, 1992 allowed SEBI to conduct search and seizure operations on a suspect’s premises after obtaining permission from a First Class Judicial Magistrate. The Bill amends the SEBI Act, 1992 by empowering the SEBI Chairman to authorise such a search and seizure operation without having to secure permission from a Judicial Magistrate. The Bill delegates to SEBI the power to formulate regulations regarding search and seizure, in absence of which, the provisions of Code of Criminal Procedure, 1973 shall apply. The SEBI Act, 1992 allowed SEBI to attach the bank account(s) of a person who has failed to pay the penalty imposed or has disobeyed the disgorgement order up to one month with the approval of Judicial Magistrate of the First Class. The Bill amends the SEBI Act, 1992 by empowering a Recovery Officer (an officer authorised by SEBI) to attach the property and bank accounts of such a violator. The Bill also empowers the Recovery Officer to arrest and detain the said violator in prison. A similar provision has been added to the SCRA, 1956 and the Depositories Act, 1996. Settlement of cases through consent orders: The Bill allows SEBI to enter into a consent settlement with a person against whom proceedings have been initiated. This clause will be effective retrospectively from April 20, 2007, when SEBI had issued guidelines for settlement of a non-criminal investigation against market participants through a consent order, under section 15T of the SEBI Act, 1992. Similar provisions have been added to the SCRA, 1956 and the Depositories Act, 1996. Cooperation with foreign regulators: SEBI has signed several agreements with foreign regulators for exchange of information. The SEBI Act, 1992 does not have an explicit provision for this. The Bill provides SEBI powers to sign such agreements with retrospective effect from March 6, 1998, when the first such agreement was signed.

Enhancing SEBI’s Powers

Recently, there have been instances of certain collective investment schemes (CISs) attempting to circumvent regulatory oversight. In addition, some market participants have not complied with Securities and Exchange Board of India’s (SEBI) orders of payment of penalty and refund to investors. In August, the Securities Laws (Amendment) Bill, 2013 was introduced in the Lok Sabha to amend the Securities and Exchange Board of India Act, 1992 (the SEBI Act, 1992), the Securities Contract (Regulation) Act, 1956 (SCRA, 1956) and the Depositories Act, 1996. The Bill replaced the Securities Laws (Amendments) Ordinance, 2013. The Bill makes the following key amendments: a) Definition of Collective Investment Schemes The SEBI Act, 1992 defines CISs as schemes in which the funds of investors are pooled, yield profits or income and are managed on behalf of investors. It also exempts certain types of investments which are regulated by other authorities. The Bill introduces a proviso to the definition of CIS. This proviso deems any scheme or arrangement to be a CIS if it meets all three of the following conditions: (a) funds are pooled, (b) it is not registered with SEBI, or it is not exempted by SEBI Act, 1992, and (c) it has a corpus of Rs 100 crore or more. These provisions could potentially lead to some schemes not conventionally defined as CIS to fall under the definition. For instance, partnership firms operating in the investment business or real estate developers accepting customer advances could be termed as CISs. SEBI has been given the power to specify conditions under which any scheme or arrangement can be defined as a CIS. This raises the question of whether this is excessive delegation of legislative powers – usually the parent act defines the entities to be regulated and the details are entrusted to the regulator. b) Disgorgement (repayment) of unfair gains/ averted losses SEBI has in the past issued orders directing market participants to refund i) profits made or ii) losses averted, through unfair actions. The Bill deems SEBI to have always had the power to direct a market participant to disgorge unfair gains made/losses averted, without approaching a court. This power to order disgorgement without approaching a court is in contrast with the provisions of the recently passed Companies Bill, 2011 and the draft Indian Financial Code (IFC) which require an order from a court/tribunal for disgorgement of unfair gains. Further, the Bill specifies that the disgorged amount shall be credited to the Investor Education and Protection Fund (IEPF), and shall be used in accordance with SEBI regulations. The Bill does not explicitly provide the first right on the disgorged funds to those who suffered wrongful losses due to the unfair actions, unlike the draft IFC. c) Investigation and prosecution The Bill empowers the SEBI chairman to authorise search and seizure operations on a suspect’s premises. This does away with the current requirement of permission from a Judicial Magistrate. This provision removes the usual safeguards regarding search and seizure as seen in the Code of Criminal Procedure, 1973, the recently passed Companies Bill, 2011 and the draft Indian Financial Code. The Bill also empowers an authorised SEBI officer to, without approaching a court, attach a person’s bank accounts and property and even arrest and detain the person in prison for non-compliance of a disgorgement order or penalty order. Most regulators and authorities, with the exception of the Department of Income Tax, do not have powers to such an extent. d) Other Provisions of the Bill The Bill retrospectively validates consent guidelines issued by SEBI in 2007 under which SEBI can settle non-criminal cases through consent orders, i.e., parties can make out-of-court settlements through payment of fine/compensation. The United States Securities and Exchange Commission settles over 90% of non-criminal cases by consent orders. The Bill retrospectively validates the exchange of information between SEBI and foreign securities regulators through MoUs. The Bill sets up special courts to try cases relating to offences under the SEBI Act, 1992. For a PRS summary of the Bill, check this link.

Tuesday, September 3, 2013

A balancing Act- The Land Acquisition Bill

The Land Acquisition Bill is slated to be taken up for consideration and passing in the Lok Sabha. The government had circulated an amendment list in the last session of Parliament. In a column in the Financial Express, MR Madhavan discusses the major features of the Land Acquisition Bill and the associated issues that Parliament may need to consider while deliberating on the Bill. Economic growth and job creation require efficient usage of land resources. It is important that a fair and transparent process for purchase and for acquisition of land is followed. For the purchase of land, a key concern is the authenticity of land titles, and the government has drafted a Land Titling Bill for this purpose. In the case of land acquisition, the following questions need to be addressed. What are the end-uses for which public interests will trump private property rights, and justify acquisition of land from a person who is not willing to part with it? What should be the process followed? Since there is no market mechanism of discovery of prices in these cases, how should compensation be computed? Is there a need to address non-land owners who may be displaced by the acquisition process? Does the acquisition process get completed in a reasonable amount of time, and is there finality to the acquisition? In sum, do both sides—the acquirer and the land owner—perceive the process to be fair? The current Bill addresses these questions in the following manner. It defines public purpose to include infrastructure projects (as defined by the finance ministry, with some exclusions); projects related to agriculture, agro-processing and cold storage; industrial corridors, mining activities, national investment and manufacturing zones; government administered or aided educational and research institutions; sports, healthcare, transport and space programmes. It also enables the government to include other infrastructural facilities to this list after tabling a notification in Parliament. The significant difference from the current Land Acquisition Act, 1894, is that land cannot be acquired for use by companies unless they satisfy any of the above end-uses. The Bill includes a requirement for consent of the land owners in some cases. If the land is acquired for use by a private company, 80% of land owners need to give consent. If it is for use by a public private partnership (PPP), 70% of the land owners have to agree to the acquisition. The rationale of having differential consent requirements based on ownership—including the lack of any such requirement if the land is for the use of the government or a public sector undertaking—is not clear. Why should a land owner, who is losing his land care, whether the intended project is to be executed by the government or a private company? The Bill specifies that the compensation will be computed in the following manner. Three factors are taken into account: the circle rate according to the Stamp Act; the average of the top 50% of sale deeds registered in the vicinity in the previous three years; the amount agreed upon, if any, in case of purchase by a private company or PPP. The higher of these three amounts is multiplied by a factor, which varies from 1 in urban areas to a number between 1 and 2 in rural areas, depending upon the distance from the urban centre. To this amount, the value of any fixed assets such as buildings, trees, irrigation channels etc is added. Finally, this figure is doubled (as solatium, i.e. compensation for the fact that the transaction was made with an unwilling seller). The justification given for the multiplier ranging from 1 to 2 is that many transactions are registered at a price significantly lower than the actual value in order to evade taxes—the moot question is whether such under-reporting is uniform across the country? The Bill states that all persons who are affected by the project should be rehabilitated and resettled (R&R). The R&R entitlements for each family includes a house, a one-time allowance, and choice of (a) employment for one person in the project, (b) one-time payment of R5 lakh, or (c) inflation adjusted annuity of R2,000 per month for 20 years. In addition, the resettlement areas should have infrastructure such as a school, post office, roads, drainage, drinking water, etc. The process has several steps. Every acquisition, regardless of size, needs a social impact assessment, which will be reviewed by an expert committee, and evaluated by the state government. Then a preliminary notification will be issued, land records will be updated, objections will be heard, rehabilitation and resettlement survey carried out, and a final declaration of acquisition issued. The owners can then claim compensation, the final award will be announced, and the possession of the land taken. The total time for this process can last up to 50 months. The big question is whether this time frame would hinder economic development and the viability of projects? The Bill provides for an Authority to adjudicate disputes related to measurement of land, compensation payable, R&R etc, with appeals to be heard by the High Court. There are several restrictions on the land acquired. The purpose for which land is acquired cannot be changed. If land is not used for five years, it would be transferred to a land bank or the original owners. Transfer of ownership needs prior permission, and in case of transfer in the first five years, 40% of capital gains have to be shared with the original owners. Recent cases of land acquisition have been followed by public protests, and the stalling of the acquisition. Whereas some of these may be driven by political agendas, the old Act was perceived to be unfair to land owners in several ways. The challenge for Parliament is to examine the new Bill and craft the law in such a way that it is fair (and perceived as such) to land owners, while making acquisition feasible and practical for projects that are required for economic development and other areas of public interest.